दयानन्द बावनी
कवि दुलेराय काराणी
चातुर्वर्ण
ब्रह्मविद्यायुक्त वर्ण ब्राह्मण जो शीर्षरूप।
हो गए विमुक्त वही उक्त अधिकार ते॥
क्षत्रिय बाहुस्वरूप हीन पराधीन भयो।
मुक्ति के सुभक्त गिरे शक्ति के संस्कार ते॥
वैश्य उदररूप वो विशेष रोगग्रस्त भयो।
भये ख्वार खस्त अविवेक व्यवहार ते॥
काराणी कहत आर्य देह के आधारथंभ।
शूद्ररूप पैर काट डारे हैं कुठार ते॥१५॥
























