मैं तेरे प्रेम की धुन में गाता हुआ

0
62

तेरे मन्दिर में आया करूँ

(तर्ज- तुम अगर साथ देने का वादा करो)

मैं तेरे प्रेम की धुन में गाता हुआ
जब कभी तेरे मंदिर में आया करूँ।
मैं तेरे प्रेम की धुन में………..

हे प्रभो! मुझ को इतना बता दो ज़रा
कौन सी भेंट सेवा में लाया करूँ।
मैं तेरे प्रेम की धुन में………..

१. मूर्ति को तो घड़ता है यह आदमी,
और फूलों को भगवन् बनाता है तू।
इस तरफ़ आदमी की है कारीगरी,
उस तरफ़ सारे जग का विधाता है तू।
किस तरह फूल जो कि हैं तेरी कृति,
आदमी की कृति पर चढ़ाया करूँ।
मैं तेरे प्रेम की धुन में…………

२. आदमी ने बना ली तेरी मूर्ति तेरी,
सूरत कहीं नज़र आती नहीं।
उम्र भर इस को यूँ ही खिलाते रहो,
मूर्ति तो कोई चीज़ खाती नहीं।
मूर्ति को खिलाना बेफ़ायदा हुआ,
फिर तुझे किस तरह मैं रिझाया करूँ।
मैं तेरे प्रेम की धुन में…………

३. मानता हूँ कि तू मूर्ति में भी है,
इसके बाहर भी तो तू ही मौजूद है।
घर के बाहर ही बैठा मिले तू अगर,
फिर अन्दर से बुलाना तो बेसूद है।
‘पथिक’ है मूर्ति में ही यह मान कर,
एक देशी तुझे क्यों बनाया करू।
मैं तेरे प्रेम की धुन में……..