कहीं झूठ कहीं छल
(तर्ज-कभी धूप कभी छाओं)
कहीं झूठ कहीं छल
कहीं झूठ तो कहीं छल।
नर तन चोला फिर न मिलेगा
इन बदियों से टल।
कहीं झूठ कहीं छल……
मिल के रहेगा इस दुनियाँ में
सब कर्मों का फल ।
कहीं झूठ कहीं छल…….
१. राम राम मुँह में बगल में
छुरी लिए फिरता।
जो फिरता सब को गिराता
अन्त वही गिरता ।
पाँव में ठोकर लगेगी प्यारे
आज नहीं तो कल।
कहीं झूठ कहीं छल…….
२. मिट्टी मिला आटा दूध में
मिले यहाँ पानी।
हर इक वस्तु में मिलावट
करे बेईमानी।
जिसने किया वो भरेगा
इक दिन है यह नियम अटल।
कहीं झूठ कहीं छल…………
३. बुरे का मुँह काला
भले का अन्त भला कहते।
कहने वालों ने कहा है
सत्यमेव जयते।
चमक उठेगा जीवन
तेरा धर्म के पथ पर चल।
कहीं झूठ कहीं छल…………
४. ऋषि मुनि योगी
सभी ने तुझे है समझाया।
ग़ज़ब है तू फिर भी अभी
तक समझ नहीं पाया।
तब समझेगा जब निकलेंगे
‘पथिक’ तुम्हारे बल ।
कहीं झूठ कहीं छल…………










