दयाधन ! हो तव जय जयकार ॥ ध्रुव ॥
भारत नहीं किन्तु ऋषिवर ! तव ऋणी सकल संसार ॥ ध्रुव ॥
सघन अविद्या-घन-पटली में लुप्त हुआ श्रुतिसार।
सदय हृदय से किया आपने, फिर उसका निस्तार ॥ १।
जीवनज्योति जगी जनता में, विनसे विविध विकार।
ज्ञानसूर्य की दिव्य छटा में, छिटके शास्त्र-विचार ॥ २ ॥
राग-रोष, दुःख-दोष-कोष का, किया आशु संहार।
परम पुण्य तव प्रेममन्त्र का, सबमें हुआ प्रचार ॥ ३ ॥
विश्ववन्द्य श्रीदयानन्द ने किया परम उपकार।
‘श्रीहरि’ ऋषिवर के चरणों में, वार-वार जयकार ॥ ४ ॥










