नारी है निकेत सब,दिव्य ललित भावों का

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नारी है निकेत सब, दिव्य ललित भावों का

नारी है निकेत सब,
दिव्य ललित भावों का,
प्रतिमा मधुरिमा की,
प्रेम की परम धार।
उसकी नारि जाति को,
सीता जनकनन्दिनी,
कर गई पवित्र थी,
शुभ निज जन्म धार ॥ १ ॥

उसी के सुचरित्र को,
स्वजीवन में धारके,
भारत की भामिनियो !
निज जन्म लो सुधार।
सीता की पुण्य स्मृति में,
सीताष्टमी का पर्व है,
जो है पतिव्रताओं के,
पातिव्रत्य का आधार ॥ २ ॥