फूल बरसाते गुणी पद ज्ञान के गाते चले ।
फूल बरसाते गुणी पद ज्ञान के गाते चले ।
लाख ही लाहौरवासी शोक उपजाते चले ॥
हाय मरघट में विराजे आर्य पण्डित लेखराम ।
तर गये जगदीश के गुण गाय पण्डित लेखराम ॥ १४ ॥
(चिता लगाना)
ब्रह्मवादी वीर चर्चा ज्ञान की करने लगे।
साधु साधनशील समिधा कुण्ड में भरने लगे ॥
धीर के शव को चिता में धीर धर, धरने लगे।
काल की करतूत से सब सूरमा डरने लगे ॥
यों न सोये थे छपरखट छाय पण्डित लेखराम ।
तर गये जगदीश के गुण गाय पण्डित लेखराम ॥ १५ ॥
(नरमेध और महादाह)
आग दी जलने लगा तम चूर चूना हो गया।
हाय रे नरमेध होली का नमूना हो गया ॥
आ मिल मुनि को दिवाली दाह दूना हो गया।
वीरता का राजमन्दिर आज सूना हो गया ॥
हा मिले ‘शंकर’ पिता से जाय पण्डित लेखराम ।
तर गये जगदीश के गुण गाय पण्डित लेखराम ॥ १६ ॥
(पण्डितजी का नाम और यश)
शुद्ध ज्ञानागार में गुरुभक्ति भरने के लिए।
धर्म-करी को कर्म-कानन में विचरने के लिए ॥
वेद का उपदेश चारों ओर करने के लिए।
एक शंकर का निरन्तर ध्यान धरने के लिए ॥
नाम-सुत को दे गये यशराय पण्डित लेखराम ।
तर गये जगदीश के गुण गाय पण्डित लेखराम










