वेदविद्या के विनोदी, बुद्धि बुद्ध विहार थे।

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वेदविद्या के विनोदी, बुद्धि बुद्ध विहार थे।

वेदविद्या के विनोदी, बुद्धि बुद्ध विहार थे।
मातृभू के मान मोदी, धैर्य-धर्माधार थे ॥
तर्क के तिग्मांशु, तारन, सत्यसागर-सार थे।
पूज्य-प्रभु-परमेश, पावन, प्रेम पारावार थे ॥
यवन-घन रावण निशाचर हेतु ‘सूर्य’ समान थे।
धर्मवीर महान् थे शर, लेख राम समान थे ॥ १॥

ले दयानन्दर्षि गुरु की, ज्ञान-पूंजी पाथ में।
कल्पतरुवत् धर्म-तरु की, शाख-श्रद्धा साथ में ॥
तर्क की तलवार लेकर, ‘ओ३म्’ का झण्डा हाथ में।
घोषणा की घोर घर-घर, नित्यवृत्ति नाथ में ॥
वेद धर्म प्रचार व्रत कर, पालते, प्राण थे।
धर्म महान् थे शर, लेख राम समान थे ॥ २ ॥

म्लेच्छ तम को मारना ही मुख्य मुनि का काम था।
शास्त्र-शस्त्र सुधारना ही, श्रेय था, संग्राम था ॥
पाप-पुञ्ज पछारना ही, ‘पथिक’ का, प्रोग्राम था।
धर्म धीरज धारना ही, राम को अभिराम था ॥
‘आवें, अड़ें, अगुआ इधर’ यह आर्य के आह्वान थे।
धर्मवीर महान् थे शर, लेख राम समान थे ॥ ३॥

शास्त्रार्थ के संग्राम में, रिपु हारकर रोने लगे।
अभियोग आदि अकाम में, खण्डित, ‘खुदी’ खोने लगे ॥
‘बस क्रत्ल काफिर को करो’, निस, निन्द्यहिय होने लगे।
‘अजमते मजहब भरो’, विष-वल्लरी बोने लगे ॥
शुद्धि-हित आ दुष्ट छल कर, बस गया, वह त्राण थे।
धर्मवीर महान् थे शर, लेख राम समान थे ॥४॥

विश्वास से बनकर सगा, वैरी वहीं रहने लगा।
पर पाप-पंकधि में पगा, दुश्मन बना देकर दगा ॥
खूँख्वार खञ्जर मार डटकर, भीरुता भय से भगा।
बोध-बेलि बिगार कर, हर ज्योति-जीवन जगमगा ॥
मरते समय तक धैर्य धर, करते रहे श्रुति गान थे।
धर्मवीर महान् थे शर, लेख राम समान थे ॥५॥

धर्मवीर ! सदा तुम्हारा वेदहित सर्वस्व वारा,
धर्म पर ही ध्यान था। वेद पर बलिदान था ॥
आर्यकुल आदर्श प्यारा, मोद था अभिमान था।
‘सत्य का सब लें सहारा’, लक्ष्य मुख्य महान् था ॥
‘वेद पर बलिदान का कर लें’ विशेष विधान थे।
धर्मवीर महान् थे शर, लेख राम समान थे ॥ ६ ॥

आर्य मिल सब आपके गुण, ज्ञान गौरव गाएँगे।
ऋषि-मिशन पूरा करें पुनि, आपके पद पाएँगे ॥
‘वीर के बलिदान का दिन’ मोद मान मनाएँगे।
आज यदि व्रत लें मनस्विन् ! ‘विश्व आर्य बनाएँगे ‘ ॥
धैर्यधर थे वीरवर नर, आप आर्य महान् थे।
धर्मवीर महान् थे शर, लेख राम समान थे ॥ ७ ॥