मत बैठे वसन्त निहारो
मत बैठे वसन्त निहारो,
उठो होली खेलो उमंग बगारो ॥ टेक ॥
फूला फाग प्रेम रसिकों को, प्रीति पसार पुकारो।
मित्रो, परता त्याग आग में झगड़े झाड़ पजारो ॥ १ ॥
उठो, होली खेलो, उमंग बगारो ॥
नवल पत्र पाये वृक्षों में निरखो आँख उघारो।
यों प्यारी उजड़ी जनता को कर प्रसन्न शृङ्गारो ॥ २ ॥
उठो, होली खेलो, उमंग बगारो ॥
पूरा मेल करो आपस में वैर विरोध विसारो।
भेद भिन्नता पास न झाँके ऐक्य प्रयोग पसारो ॥ ३ ॥
उठो, होली खेलो, उमंग बगारो ॥
सत्यागार बना लो मन को, मधुर वाक्य उचारो।
त्याग प्रसाद धर्म के द्वारा, कर्म-कलाप सुधारो ॥ ४ ॥
उठो, होली खेलो, उमंग बगारो ॥
गूदा एक फाँक दस भासें, ऊर्वारुक इव यारो।
शुद्ध भीतरी ऐक्य भाव पै, असदनेकता वारो ॥ ५ ॥
उठो, होली खेलो, उमंग बगारो ॥
देखो विपदा-वैतरणी को, धीर न हिम्मत हारो।
बन कैवर्त्त नीति-नैया के सबको पार उतारो ॥ ६ ॥
उठो, होली खेलो, उमंग बगारो ॥
मार सहो निर्दय दुष्टों की, परन्तु न किसी को मारो।
ऐसे तप से पा सकते हो, जीवन के फल चारों ॥ ७॥
उठो, होली खेलो, उमंग बगारी ॥
दास, गुप्त, वर्मा, शर्मा, सब अन्त्यज, डोम चमार।
हिंसा हीन असहयोगी हो, कष्ट कंटक संहारो ॥ ८ ॥
उठो, होली खेलो, उमंग बगारो ॥
वीर ! कहो अन्याय दम्भ को, न्याय नृसिंह बिदारी।
दीन-देश प्रह्लाद भक्त को, सौंप स्वराज्य उबारी ॥ ९॥
उठो, होली खेलो, उमंग बगारी ॥
धर्म, दया आनन्द लोक में, निशि वासर विस्तारो।
आर्यजाति को पारतन्त्र्य की अवनति से उद्धारी ॥ १०॥
उठो, होली खेलो, उमंग बगारी ॥
भाई! जीवन को भारत के भाल स्वतिलक पै वारी।
‘शंकर’ श्री गुरु गाँधीजी का, गौरव ज्ञान-प्रचारो ॥ ११॥
उठो, होली खेलो, उमंग बगारो ॥










