ऋतुराज वसन्त विराज रहा
ऋतुराज वसन्त विराज रहा,
मनभावन है छवि छाज रहा।
बन-बागन में कुसुमावलि की,
सुखदा सुषमा वह साज रहा ॥
यव गेहुँ चना सरसों अलसी,
सब ही पक आज अनाज रहा।
यह देख मनोहर दृश्य सभी,
अति हर्षित होय समाज रहा ॥
उपलक्ष्य इसे करके जग में,
शुभ होलक-उत्सव हैं करते।
अधपक्व, यवाहुति दे करके,
सब व्योम सुगन्ध से हैं भरते ॥
सब सज्जन-वृन्द अतः जग में,
नव सस्य-सुयज्ञ इसे कहते।
कुल-वैर-विसार स्नेह-सने,
हुलसे सब आपस में मिलते ॥
चर पान इलायचि भेंट करें,
निज मित्र-समादर हैं करते।
हृदयंगम गायन-वादन से,
मुद से सब हैं मन को भरते ॥










