ओज औ माधुर्य में बीभत्स आकरके मिला।
ओज औ माधुर्य में बीभत्स आकरके मिला।
चाटलों के पुंज बीच प्रसून बिम्बी का खिला ॥ १५ ॥
किन्तु इस त्यौहार में भी तो दिखाती थी झलक।
उस परस्पर प्यार की जिसमें रहे सच्ची ललक ॥
नव उमंगों के सहित आमोद उठता था छलक।
सो गई जातीयता भी खोल देती थी पलक ॥
भूल करके भेद और विरोध की बातें अखिल ।
एक ही रंग बीच रंग जाती थी सारी जाति मिल ॥ १६ ॥
किन्तु अब इस पर्व का है हो रहा जैसा पतन।
किस विबुध का देखकर उसको व्यथित होगा न मन ॥
प्रति बरस है म्लान होता कंज-सा उसका वदन।
है बिगड़ती जा रही इसकी बड़ी सुन्दर गठन ॥
धूल में मिल रही इसकी सभी मधु मानता।
मत्तता आमोद मंजुलता उमंग महानता ॥ १७ ॥
विश्व में जिस पर्व से जो जाति है गौरवमयी।
है सदा जिसने मिटाई कालिमा जिसकी कई ॥
है जिसे जिससे मिली बहु जीवनी धारा नई।
कीर्ति जिसके ब्याज से जिसकी दिगन्तों में गई ॥
आह ! भ्रान्त अतीव बन उस जाति के ही वंशधर।
नाश करते हैं इसे नहिं देख सकते आँख भर ॥ १८ ॥
दल अजानों का कुचालों में इधर उलझा रहे।
दल सुबोधों का उधर निज गौरवों में ही बहे ॥
तो बता दो जाति किससे निज व्यथाओं को कहे।
यह कुअवसर में लपक कर किसके दामन को गहे ॥
निज परव त्यौहार में जिनकी नहीं ममता रही।
वे मरम जातीयता का जानते कुछ भी नहीं ॥ १९ ॥
मण्डली नवशिक्षितों की है नये रंगों ढली।
है पुराने ढंगवालों के लिए सब ही भली ॥
वे नये ढंग से खिलाना चाहते हैं सब कली।
ये उसे तजते नहीं जो बात है अब तक चली ॥
द्वंद्व में पड़कर इसी, अब वह नहीं नाता रहा।
सब परव त्यौहार का वह रंग ही जाता रहा ॥ २०॥
बयालीस साल पहले सामने जो था समा।
जो अनूठापन परस्पर प्यार था आँखों रमा ॥
रंग जैसा उन दिनों आमोद का देखा जमा।
जिस तरह से नव उरों में चाव रहता था थमा ॥
आह। हमें आज दिन वह बात दिखलाती नहीं।
वह उमंगें बादलों-सी झूमती आती नहीं ॥ २१ ॥
उन दिनों थी ज्योति फैली ज्ञान की इतनी नहीं।
उन दिनों भी सब कुचालें आज दिन की-सी रहीं ॥
किन्तु अपनापन रहा था आज से बढ़कर कहीं।
इन दिनों-सी तब न थीं जातीयता भीतें ढहीं ॥
एक दिल हो उन दिनों जैसे मिले लगते नहीं।
लोग वैसे आज दिन एक रंग में रंगते नहीं ॥ २२ ॥
किन्तु हमको है बहुत नवशिक्षितों से ही गिला।
प्यार से क्या वे अजानों को नहीं सकते मिला ॥
क्या मनोमालिन्य की जड़ वे नहीं सकते हिला।
वे पुनः जातीयता को क्या नहीं सकते जिला ॥
हैं न ये बातें असम्भव जो हृदय में त्याग हो।
जाति को अपने परव त्यौहार का अनुराग हो ॥ २३ ॥
क्या हुआ लिक्खे पढ़े जो चित्त में समता न हो।
निज परव त्यौहार की औ जाति की ममता न हो ॥
जो परस्पर प्यार में सद्भाव में रमता न हो।
थामने से भी हृदय का वेग जो थमता न हो ॥
वह बड़प्पन सभ्यता गौरव धरातल में धंसे।
रंग जिसपर लोकहित की लालसा का नहिं लसे ॥ २४ ॥
जो परव त्यौहार अपने हम टिकावेंगे नहीं।
जो बुरी परिपाटियों को हम मिटावेंगे नहीं ॥
जो बहकते भाइयों को पथ दिखावेंगे नहीं।
जोति जो घिरते तिमिर में हम जगावेंगे नहीं ॥
तो भला किसको पड़ी है और की जो ले बला।
जाति ही सकती है कर निज जाति का सच्चा भला ॥ २५ ॥
आज भी वह बात इनमें है कि जिससे हो भला।
हम सुमति के साथ सकते हैं सुफल जिससे फला ॥
हम तिनक कर भूल, इनका घोंट सकते हैं गला।
पर कहाँ फिर पा सकेंगे देशव्यापी बहु कला ॥
जाति जो नहीं पर्व उत्सव-प्रेमधारा में बही।
वह रही तो नाम को संसार में जीती रही ॥ २६ ॥
ऐ नई पौधें करो मत जाति-हित में आतुरी ।
फूँक दो अनुराग निजता धुन भरी वर बाँसुरी ॥
ऐ पुराने ढंगवालों छोड़ दो चालें बुरी।
आँख खोलो फेर लो अपने गले पर मत छुरी ॥
प्यार से मिल, गोद में निज उत्सवों को लो लिटा।
जाति जीती कब रही निज कीर्ति-चिह्नों को मिटा ॥ २७










