उदगादयमादित्यो विश्वेन सहसा सह। द्विषन्तं मह्यं रन्धयन्मो
अहं द्विषते रधम्॥ ऋः १. ५०.१३
तर्जः माझा होशिलका (3)
जानो अहिंसा, अहिंसा अहिंसा जानो अहिंसा,
परिपूर्ण आस्तिक हो जाओ (2) जानो अहिंसा,
जब तक प्रभु-विश्वास जमे ना (2) अटल न्याय जब तक समझें ना (2)
कैसे कहें स्वयं को आस्तिक, कर लें यदि हिंसा ॥
॥ जानो ॥
आत्मज्ञान ही आत्मप्रकाश है (2) इसे ना समझो तो विनाश है (2)
जो अनात्म है, बन विद्वेषी, सही पथ से गिरता॥
॥ जानो ॥
परिपूर्ण आदित्य प्रभु है (2) बल और तेज का प्रथित विभु है (2)
है सर्वज्ञ अखण्डित राजा, बल सामर्थ्य बड़ा॥
॥ जानो ॥
जो ब्रह्माण्ड में सदा से जागृत (2) न्याय दण्ड सब उसके आश्रित (2)
हिंसक दण्ड उसी से पाये, ना हो बर्बरता।
॥ जानो ॥
जग व्यवस्था ईश्वर की है (2) नियम जो तोड़े वही दुःखी है (2)
दण्डविधान से नाश हो रहा, पापी घाती का॥
॥ जानो ॥
परमेश्वर के नियम ना बदलें (2) वैर द्वेष से क्यों फिर झगड़ें (2)
प्रेम अहिंसा का प्रसार कर पाओ मानवता॥
॥ जानो ॥
सभी मित्र-शत्रु को मनाओ (2) मानवता का पाठ पढ़ाओ (2)
हिंसक के ना रहें वंशगत, त्यागो अशिवता॥
॥ जानो ॥
(अनात्म) आत्मा को न जाननेवाला। (विद्वेषी) शत्रु। (विभु) अत्यन्त महत्ता वाला, महिमावान।
(बर्बरता) पशुता, जंगलीपन। (घाती) हिंसक, मारने वाला। (वंशगत) वश में रहना। (अशिवता)
अकल्याणता। (प्रसार) फैलाना, बिखेरना।










