हम आपस में लड़ लड़ कर (धुन- है शुक कि तू है लड़का)
हम आपस में लड़ लड़ कर –
लुट पिट कर आज बिगड़ कर,
रोते क्यों घर मैं बड़कर,
अगर गलती ना होती।। टेक ।।
वैदिक सम्यताका, धा देश पुजारी,
थी उच्च मान्यता, एक रोज हमारी,
यह दुनिया वाले सारे,
कभी शिष्य थे हमारे ।।
गये चरणो मे पड़ पड़ कर,
अगर गलती ना होती ।।1।।
कभी भूमण्डल पर था राज हमारा।
सिर पर कोहनूरी था ताज आज
महा कंगाल शेरों के आगे हमारा।
श्रृंगाल ।। गुर्राते नहीं अकड़ कर,
अगर गलती ना होती।।2।।
आज विश्व फटा क्या
भारत भी कटा है।
हिस्सों के अन्दर अब देश बटा है।।
न्यारे-2 परिवार करके
नफरत की दीवार।
चलते क्यों आज बिछड़कर,
अगर गलती ना होती ।।3।।
भाई के खून की भाई को प्यास है।।
यह रोग पुराना अब भी तो पास है।।
‘प्रेमी’ ऋषि दयानन्द काट देते सारे फंदे।
बस जाता नगर उजड़ कर,
अगर गलती ना होती।।4।।
























