को अस्मिन्नायो व्यदघाद विषुवृतः, पुरुवृतः सिन्धु सृत्याय जाताः ।
तीव्रा अरुणा लोहिनीस्ता स्त्रधूस्त्राः, उर्ध्वा अवाचीः पुरुषे तिरश्चीः
॥ अथ. १०.२.११
तर्जः मल्हारीले वेन्मेधमे विन्तु विलरगाई
हृदय सिन्धु से रक्त-जल की भी
नदियाँ निकलती हैं शुद्ध होने को
फिर मल को लेके बहतीं हृदय में
फिर शुद्धता पाने को
हृदय सिन्धु…
बाह्य जगत में जो अद्भुत व्यवस्था है
सिन्धु जल परिणत होता है वाष्प में
बनके वो बादल बरसता है धरा पर
फिर नदियाँ रहतीं सागर प्रवास में
शुद्ध और अशुद्ध रक्त बहता हृदय में
यह क्रम निरन्तर चलता है
जीवन चलाने को
हृदय सिन्धु…
वाह! मानव देह में किसने रक्त जल की
नदियों को देह में स्थापित किया
विद्यमान वो कई कई रूपों में
हृदय-सिन्धु में बहती चक्कर काटे
इसकी गति तो अति तीव्र रहती
परम पुरुष ब्रह्मा की महिमा
कौशल्य दिखाने को
हृदय सिन्धु…










