ग्रुन्थिं न वि ष्यं ग्रथितं पुंनान् ऋजुं चं गातुं वृजिनं चं सोम ।
अत्यो न क्रंद्रो हरिरा सृजानो मयाँ देव धन्व प॒स्त्या॑वान्
॥ ऋ. ६.६७.१८
तर्ज मला काय झाले कळेना
हृदय गांठ खोला करोना!
पापों के बन्धन से मुक्ति दो भगवन्
दुःख कष्ट क्लेश हरोना !
॥ हृदय गांठ ॥
खुल जायें गाठें इक इक हृदय की
तो छिन्नभिन्न संशय होवें प्रभुजी
कर्म शिथिल होवें बन्धन के सारे
ज्ञान हृदय में भरो ना!
॥ हृदय गांठ ॥
हर लो कुटिलता दे दो सरलता
सत्ज्ञान दे दो कि पायें सफलता
ऋजु मार्ग प्यारा उसी का सहारा
ऋतवती हमको करो ना!
॥ हृदय गांठ ॥
है प्रार्थना तुझसे ऐ मेरे भगवन् !
हूँ सन्तान तेरी मैं तेरे समर्पण
मुझको पिता अपनी बाँहों में ले लो
दौड़ के आगे बढ़ो ना!
॥ हृदय गांठ ॥
(ऋजु) सीधा, सरल, अनुकूल। (कुटिलता) टेढ़ापन, छल, दुष्टता। (संशय) शंका, भ्रम।










