आर्य और दस्यु की पहचान

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वि जानीह्यार्यान्ये च दस्य॑वो व॒र्हिष्मते रन्ध्या शासदव्रतान् ।

शाकी भव॒ यज॑मानस्य चोद्विता विश्वत्ता ते सधुमादेषु चाकन ॥ ऋ. १.५१.८

तर्जः मयतमी पाटिय युम श्रुति मयुरुतम

हे इन्द्र राजन् निज साम्राज्य का यदि तू है अधिनायक।
आर्य-दस्यु का भेद समझ कर खुद को बना दे लायक॥
आर्य का हृदय तो सरल ही होगा, दस्यू का हृदय है कपटी
सेवाव्रत से हीन है दस्यु आर्य की समचित्त है करनी
आर्य-दस्यु का विवेक कर के राष्ट्र सेवक बनके हो पावक
॥ हे इन्द्र राजन्॥

हे राष्ट्रनायक बन शक्तिशाली, सैन्य शक्ति अपनी बढ़ा (2)
प्रभावी बन के राज्य कोष की शक्ति में भर प्रकर प्रभा ।
राज्य-शत्रु का बन विनाशक और प्रजा का सुखदायक।
॥ हे इन्द्र राजन्॥

तेरे राज्य के यजमानों का प्रेरणा दायक स्त्रोत बन (2)
राष्ट्र भक्त और धर्मपरायण जनों का बन सहचरी स्वयं
जिससे स्वार्थ-वृत्ति वाले जन सिर ना उठायेंगे नाहक॥
॥ हे इन्द्र राजन्॥

अपना राष्ट्र बना चिरविजयी चिर स्थायी चिर प्रशंसित (2)
प्रजा जनों का रच के उत्सव कर संगोष्ठियाँ आयोजित,
स्तुत्य बनेगा प्रजा जनों का, प्रजा भी पायेगी राहत ॥
॥ हे इन्द्र राजन्॥

हे आत्मन् शत्रुघ्न इन्द्र शरीर राष्ट्र का तू राजन् (2)
तेरे अन्तस् के साम्राज्य में दस्यु विचार भी हैं आसन्न
इन दस्युओं का बन विध्वंसक आर्य विचार कर जागृत ॥
॥ हे इन्द्र राजन्॥

(अधिनायक) मालिक, मुखिया, परमेश्वर। (दस्यु) राक्षस। (समचित्त) सम्यक् अवस्था का चित्त।
(प्रकर) खिला हुआ। (सहचारी) साथी, सेवक। (आसन्न)
समीप लगा हुआ, निकटस्थ। (विध्वंसक) नाश करने वाला।