प्रीणीताश्वान्हितं जयाथ स्वस्तिवाहुं रमित्कृणुध्वम् ।
द्रोणर्णाहावमव॒तमश्म॑चक्रमंस॑व्रकोशं सिञ्चता नृपार्णम् ॥ ऋ. १०.१०१.७
तर्जः मन करा रे प्रसन्न
अश्व करो रे प्रसन्न
सर्वसिद्धि के ये कारण॥
॥ अश्व करो॥
ये अश्व हैं असाधारण, करें मार्ग को जो व्याप्त (2)
इन्हें भूखा, रथ में ना जोड़ो, हित साध के करो तृप्ति ॥
॥ अश्व करो॥
चालक उपकरण बिन कोई कार्य न होते सिद्ध (2)
युद्धोपकरण हों ऐसे जिनसे उत्पन्न हो स्वस्ति॥
॥ अश्व करो ॥
है राज्यशक्ति का मूल मनोराज्य की अवत-प्रजा
ये मूल रक्षा के साधन इन्हें रखो उत्तेजित निति ॥
॥ अश्व करो॥
युद्धोपकरण जुटाओ, रथ को सुखधारी बनाओ (2)
उपद्रव होने न पाये, रहे इन्द्रिय प्रजा की शुद्धि॥
॥ अश्व करो॥
रक्षा साधन अत्यर्थ, के प्रजा-अवत भी सूखे (2)
उत्तेजित हों ‘अश्मचक्र’ सर्वविध इन्हें सींचो तुम्हीं॥
॥ अश्व करो ॥
(अश्व) घोड़े, (इन्द्रियां)। (उपकरण) साधन। (अवत) शोक रहित, खेद रहित। (निति)
प्रतिदिन, नित, हमेशा। (उत्तेजित) प्रोत्साहित। (उपद्रव) विद्रोह, राष्ट्रीय अशांति । (अत्यर्थ) बहुताय,
अत्यधिक। (अश्मचक्र) आग्नेय पदार्थ समूह।










