तेरी अनन्त कृपा

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वि॒द्मा हि त्वा॑ तुविकूर्मि तुविद॑ष्णं तु॒वीम॑घम् । तुव॒मा॒त्रमवतो॑भिः

।। साम ७२६

तर्जः मधुर यमुनो मनसित मासम (राग-दरबारी)

तू कितना कृपालु है कृपानिधे! करता दया की वर्षा निरन्तर,
करता रक्षा, तृष्ति, दीप्ति (2), कृपा दया वृद्धि का अभिसर॥ ॥तू कितना॥

दया सिन्धु तू है ‘तुविकर्मी’, तेरे ‘अवस’ की कहीं ना कमी,
प्रतिक्षण प्रतिनव पायें कृपायें, हे अनन्तकर्मा! हे अनवर ! ॥तू कितना॥

तीन लोक तीनों कालों में, निज हेतु ना कोई भी स्वार्थ,
फिर सकल ब्रह्माण्ड में तेरे, प्रतिक्षण कर्म अखण्ड अप्रतिकर॥ ॥ तूकितना॥

जग व्यवस्थापक, स्त्रष्टा धर्ता, ऋतुचक्र का चालन कर्ता,
सरिता वृष्टि तुम्हीं बहाते, नाना पिण्डों के प्रतिजागर॥ ॥ तू कितना ॥

भौतिक सम्पत्तियों का स्वामी आध्यात्मिक धन का उपदानी
सत्य विवेक धर्म दया-वर्षक सभी दान पाते हैं सत्वर ॥ तू कितना॥

सूर्य चन्द्र जल वायु भूमि स्वर्ण रजत रत्न व अग्नि (2)
कहीं अन्त ना ऐश्वर्यों का और सभी धन मिले हैं हितकर॥ ॥ तू कितना॥

तुविमात्र’ हुआ निज अवसों से, रक्षा करता प्रवर बलों से (2)
तृप्त करे सबको भोगों से (2) तेरी शरण है जगत चराचर॥ ॥ तू कितना॥

अनन्तकर्मा अनन्त दानी अनन्त धन अनन्त परिमाणी (2)
ऋण से ना उऋण हो सके, करूणकरक दय हो करुणाकर॥ ॥तू कितना।

जीवों का कल्याण हेतु है, तुविदेष्ण तुविमात्र ही तू है और तु विमघ
सबके हेतु, हृदय हृदय करते सब आदर॥ ॥तू कितना॥

(तुविकर्मी) बहुत कर्मों वाला। (अभिसर) साथी, साथ देने वाला। (तुविदेष्ण) अत्यन्त
दानी। (तुविमघ) बहुत धन ऐश्वर्य वाला। (अवस) दान। (प्रतिनव) नित नया। (सत्वर)
तुरन्त । (तुवि मात्र) बहुत परिमाण या माप वाला। (उपदानी) भेंट देने वाला। (प्रतिजागर)
प्रकाशित करने वाला। (अप्रतिकर) विश्वासी। (चराचर) जड़ और चेतन (जगत)। (प्रवर)
श्रेष्ठ। (हितु) हित चाहने वाला। (करक दय) दयामय हाथ। (परिमाणी) यथावत मापदंड वाला।