न गाया ईश गुण माया का
न गाया ईश गुण माया का
गुण गाया तो क्या गाया।
न भाया पुण्य केवल पाप
मन भाया तो क्या भाया।।
तुझे संसार सागर में
कमल की भांति रहना था।
ना छोड़ी वासना घर छोड़
वन धाया तो क्या धाया।।१।।
किसी का विश्व से अस्तित्व
ही बिल्कुल मिटाने को।
अमरबेली के सदृश ही तू
छाया तो क्या छाया।।२।।
परम अनुपम गगनचुम्बी,
महल अपने बनाने को।
किसी निर्बल दुःखी का
झोंपड़ा ढाया तो क्या ढाया।।३।।
प्रकाशानन्द तो तब है
खिलाओ औरों को पहले।
मधुर भोजन अकेले आप
ही खाया तो क्या खाया।।४।।
जैसा अन्न, पानी, घी होगा।
वैसा मन, वाणी, जी होगा।










