चंचल मन है विलक्षण वस्तु।

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चंचल मन है विलक्षण वस्तु।
तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु ।।

मन ने बनाये थे रावण अरस्तु ।
तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु । ।

मन ही है बन्धन व मुक्ति का हेतु।
तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु ।।
शिवमस्तु शुभमस्तु कल्याणमस्तु
तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु ।।

रे साधक! तू कब होवेगा उन्मुक्त ?
जब हो जायेगा मैं से मुक्त।