बार बार तोहे क्या समझाऊँ
तर्ज – बार-बार तोहे……
बार बार तोहे क्या समझाऊँ,
ओ नादां इन्सान।
अवसर सुनहरा है,
धर ले प्रभु का ध्यान ॥
कल-कल करती नदियाँ
जब इठलाती है उस दाता के गीत
“सचिन” वो गाती है
सकल विश्व का पालनहारा,
ना कोई प्रभु समान अवसर सुनहरा है……
किस भाँति रच दिये
प्रभु ने वन-उपवन रंग बिरंगे
पुष्प लता महके गुलशन
भानु शशि रचाये उसने,
ऊँची उसकी शान अवसर सुनहरा है…..
सहरा में कलियों को वही खिलाता है
मोज़िजा के खेल वही दिखलाता है
सर-सर करती मन्द पवन,
गाती उसका गान अवसर सुनहरा है…….
पी-पी-पी-पी बोल पपीहा गाता है
इस डाली से उस डाली पे जाता है
झूम-झूम के मान रहा वो,
दाता का अहसान अवसर सुनहरा है…….










