ये मेरे भवन ये तेरे भवन कब छोड़ चले
स्वर :- ओ मेरे सनम ओ मेरे सनम
ये मेरे भवन ये तेरे भवन कब छोड़ चले
अन्जान है हम दो
दिन के सब मेहमान है हम।।
क्या लाये थे क्या ले के चलो,
ये तन भी देगा साथ कहां
नैकी की घोडी पर जो चढ़े,
उनकी सजती बारात यहां
जो बोया है वो ही काटोगे
बस कर्मों का खलिहान है हम।।
दो दिन के सब मेहमान है हम।।१।।
मालिक ने दिया है सबकी खातिर,
उसका ही दिया सब खाते है,
अफसोस है फिर भी दुनियां में,
कितने भूखे सो जाते है।
गमगीन सी आंखे देख रही है,
सोचो कैसे नादान है हम।
दो दिन के सब मेहमान है हम ।। २।।
तृष्णाओं की डोरी साथ लिये,
उडती है पतंग हवाओं में
सपनों के सारे ताजमहल,
जल जाते सभी चिताओं में
दुनियां में सुरेंन्द्र आये है,
कुछ देने को इम्तिहान है हम।
दो दिन के सब मेहमान है हम।। ३।।










