नारी का अपमान सभा में पुण्य है या पाप

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नारी का अपमान सभा में पुण्य है या पाप

नारी का अपमान सभा में
पुण्य है या पाप,
साफ साफ कहो आप। टेक।

मैं जब दुष्टों ने घेरी,
बचाओं लाज टेरी बहुतेरी,
एक सुनी ना किसी ने मेरी,
डर से कांप कांप,
करती रही मैं विलाप ।। 1 ।।

केश पकड़ कर मारा चांटा,
सारी सभा में था सन्नाटा,
किसी ने भी नहीं उसको डांटा,
बैठा था चुप चाप सारा
आपका स्टाफ।।2।।

यदि आप उनको डर देते,
सारी समस्या हल कर देते,
दुनियां के सन्मुख धर देते
धर्म अधर्म का नाप,
हरते करूण कलाप ।।3।।

भीष्म बोले नीच दुर्योधन
का खाया था मैं दुषित अन्न,
इसीलिये तो था कलुसित मन,
करूं पश्चाताप, “”प्रेमी”
प्रायश्चित है जाप ।।4।।