वाचिक अधर्म चार हैं

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वाचिक अधर्म चार हैं

वाचिक अधर्म चार हैं
वाणी अनुशासित कर, ।। टेक ।।
पोरुष्यं अर्थात कटु उच्चारण।
प्रथम पाप का करो निवारण।
मृदु सत्य व्यवहार है सदा
वाणी से पर हित कर ।।1।।

अनृत भाषण झूठ बोलना,
धरती और आकाश तोलना,
तेरे लिये बेकार है,
चाहे और को प्रभावित कर ।।2।।

पैशुन्यं अर्थात चुगली करना,
वाणी के इस पाप से डरना,
सारा जग परिवार है,
यह सार प्रतिपादित कर।।3।।

असम्बद्ध प्रलाप है बात उड़ाना,
चौथा पाप वाणी का माना।
प्रेमी धर्म प्रचार है,
भत किसी को आतंकित कर ।।4।।