यदि नहीं जान पाये अपने आपको फिर कैसे जानोगे

0
10

यदि नहीं जान पाये अपने आपको फिर कैसे जानोगे (धुन- कैसा सिला दिया.)

यदि नहीं जान पाये अपने आपको,
फिर कैसे जानोगे भैया पुण्य पाप को।

कौन हो कहां से आये कहां जाओगे,
यह भी ना जान पाये पछताओगे ।।
प्रायश्चित में बदला नहीं पश्चाताप को।
फिर कैस समझोगें……

वेद स्मृति सदाचार के विचार को,
आचरण में धारा नहीं सद्व्यवहार को,
धर्म समझा अलफी माला तिलक छाप को ।।
फिर कैसे समझोगेंगे…..

चित्त-वृत्तियों का भी निरोध ना किया,
विषय वासनाओ का विरोध ना किया,
भावना से जपा नहीं ओ३म् जाप को।
फिर कैसे समझोगें…….

सरगम सीखी नहीं जीवन के संगीत की,
लय स्वर तान राग के विपरीत की,
कहते हो वरदान ‘प्रेमी’ अभिशाप को।।
फिर कैसे समझोगें. ।।4।।