आदि में थी श्रद्धा जिसके अन्त में आनन्द था।
आदि में थी श्रद्धा जिसके
अन्त में आनन्द था।
धीर वीर संन्यासी वह
स्वामी श्रद्धानन्द था।।
छः गुलामियों ने यहां
अपने डेरे डाले थे,
भारत वासियों ने गोद्वियों
में नाग पाले थे आकर
के सम्भाले थे,
काटा उसने फन्द था।।1।।
स्वयं को सुधार करके
लग गया सुधार में,
विद्या का प्रकाश किया
अज्ञान अन्धकार में,
जीवन परोपकार में,
बिताना ही पसन्द था।।2।।
अच्छी तरह समझ करके
अपने और बेगानों को,
आर्य बनाया फिर से
मूले मलकानों को,
समझाकर के नादानों को,
खोला द्वार बन्द था।।3।।
बिछड़े हुये भाई अपने
परिवार में आने लगे,
यह मिलाप देख मुल्ला
मौलवी घबराने लगे,
योजना बनाने लगे,
छिड़ा भारी दृन्द था।।4।।
सिर फिरे रशीद ने शुद्धि
के बहाने से प्रेमी देवता को
घातक गोली के निशाने से,
मिटाया जमाने से,
घातक मति मन्द था।।5।।










