रक्षा चाहते हो जो लाज की।
रक्षा चाहते हो जो लाज की।
बात मानों ऋषि राज की।।
कल की परसों की बातों को छोड़ो।
वर्षों पहले ये आवाज की।।
आज देखो तो चारों तरफ,
दुनिया वाले ये क्या कह रहे।
तेरी हस्ती मिटा देने को,
तन के कण-कण में विष भर रहे।।
चाल घातक दगाबाज की
बात मानों ऋषि…….. || 11
सिर के ऊपर से चोटी गई,
गल से यज्ञोपवीत गया।
धर्म संस्कृति मर्यादा का,
कहें युग ही वह बीत गया।।
घड़ी नाजुक बड़ी आज की
बात मानों ऋषि…… 2
वह जीना भी जीना है क्या,
जिसमें जीने का साहस नहीं।
वह जाति भी जिन्दा नहीं,
जिसका कोई इतिहास नहीं।।
जिन्दगी क्या है मोहताज की,
बात मानों ऋषि……..।। 3 ।।
‘प्रेमी’ मिलकर के धोखा दिया,
हमें अपनों ने बेगानों ने।
धर्म निर्पेक्ष नारा लगा,
राजनैतिक इन दीवानों ने ।।
कोढ में भी खड़ी खाज की,
बात मानों ऋषि……।। 4 ।।










