काया एक पिंजरा है
काया एक पिंजरा है,
पंछी सैलानी का।
जिन्दगी और कुछ भी नहीं,
बुलबुला है पानी का।
कुछ पाकर खोना है,
कुछ खोकर पाना है।
पाना और खोना ही,
जीवन का फसाना है।।
श्वासों की रवानी है,
ढांचा जिन्दगानी का।।1।।
दुनिया एक मेला है,
एक खेल मदारी का।
पल भर में बिछड़ जाये,
बरसों तैयारी का ।।
प्रातः एक बचपन है,
दोपहर जवानी का ।।2।।
नहीं कोई पराया है,
नहीं कोई अपना है।
अपने व पराये का,
‘प्रेमी’ एक सपना है।।
मिल मिलके बिछड़ता है,
रिश्ता हर प्राणी का।।3।।










