कुछ नहीं बन पाता

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कुछ नहीं बन पाता

कुछ नहीं बन पाता,
जब वक्त निकल जाता,
ओ३म् अनेक बार
बोल प्रेम के प्रयोगी।


अगन में पवन में,
धरन में गगन में,
जड़ चेतन में,
विश्व के कण-कण में,
है वही अनादि-नाद
निर्विकल्प निर्विवाद,
भूलते न पूज्यपाद वीतराग योगी ।।1।।

चित्त की वृत्ति हैं
पांच-विवेकी बुद्धि से जांच,
क्या है हीरा क्या हैं
कांच सांच को न आये आंच,
वेद को प्रमाण मान,
अर्थ योजना बखान,
गा रहे गुणी सुजान,
साधु स्वर्ग भोगी ।। 2।।

मात वही गुरुतात मित्र
वही है वही है, भ्रात वही है।
उसके बिन सारा जीवन
की प्रभात जग वही सूना, है।

ध्यान में धरें विरक्त,
भाव से भजें सुभक्त,
त्यागते अघी असक्त,
पोच पाप रोगी ।। 3।।

अकार उकार मकार है-
ओ३म् जगदाधार है,
दयालु दातार है
प्रेमी सृजन हार है।
शंकरादि नित्य नाम
जो भजें विसार काम,
तो बने विवेक श्राम,
मुक्ति क्यों न होगी।।4।।