धीरज धर्म मित्र अरू नारी
धीरज धर्म मित्र अरू नारी,
आपति काल परखिये चारी।
वृद्ध रोग बस जड़ धनहीना,
अन्ध बधिर क्रोधी अति दीना।
ऐसेहु पति करि जिन अपमाना,
नारि पाव जमपुर दुःखनाना।
एकइ धर्म एक व्रत नेमा,
काय वचन मन पति पद प्रेमा।
जग पतिव्रता चारि विधि अहहीं,
वेद पुराण सन्त सब कहही।
उत्तम के अस बस मन माहीं,
सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं।
जग पतिव्रता चारि विधि अहहीं,
वेद पुराण सन्त सब कहही।
उत्तम के अस बस मन माहीं,
सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं।
मध्यम पर पति देखहिं कैसे,
भ्राता पिता पुत्र निज जैसे।
धर्मविचारि समुझिकुल अहहीं,
सो निकृष्ट त्रियश्रुति अस कहहीं।
बिन अवसर भय तें रह जोई,
जानहु अधम नारि जग सोई।
पति वचक पर पति रति करई,
रौरव नर्क कल्पसत परई।
छिन सुखलाखि जन्मसत
कोटी दुखन समुझ तेहि समकोखोटी।
बिनुश्रम नारि परम गति लहई,
पतिव्रत धर्म छाँड़ि छल गहई।
पति प्रतिकूल जनम जेहि जाई,
विधवा होय पाय तरूणाई।










