तुम वेदवती का हाल सुनो री हरे

0
28

तुम वेदवती का हाल सुनो री हरे

तुम वेदवती का हाल सुनो री हरे-२
सुनो री सब सजनी ।।

वेदवती कुशध्वज की
कन्या हुई महा विद्वान्,
जिसने ब्रह्मचर्य करने का
जीवन भर लिया ठान,
तपस्या करत बनी।। तुम० १

एक दिना लंकेश्वर आया
वेदवती स्थान,
देखा रूप ताको मोहित
भयौ बिसरि गयौ सब ज्ञान,
कुमति हृदय में ठनी।। तुम० २

रावण कहै कष्ट मत सहिये
चलिये संग हमारे,
पटरानी मैं ताहि बनाऊँ
मिटि हैं क्लेश हमारे,
तजौ माला जपनी।। तुम० ३

वेदवती ने लंकेश्वर को
तप-प्रताप से जाना,
क्रोध विवश उत्तर यों
दीना भाग दुष्ट अब जाना,
कुशल चाहे अपनी ।। तुम० ४

बलकर रावण ने फिर
उसके खेंचे केश रिसाय,
दीनौ झटका वेदवती ने
लीने केश छुड़ाय,
परी दुख से धरनी ।। तुम० ५

अरे दुष्ट यह प्रण था
मेरा पुरुष अंग ना छीऊँ,
भंग किया तूने प्रण मेरा
अब नहिं पल भर जीऊँ,
प्रतिज्ञा है रखनी ।। तुम० ६

ऐसे कह फिर अग्नि
कुण्ड में अगिनी लई जलाई.
ताके मध्य बैठ देवी ने
ये आवाज लगाई,
अरे सुन दुष्ट धनी ।। तुम० ७

कारण हुआ मृत्यु का
मेरी रावण सुनि इस बार,
अन्त राम-नारी के कारण
पावै मौत गंवार-
भोग अपनी करनी ।। तुम० ८