पिताजी ! मुझको जुदा न करना

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पिताजी ! मुझको जुदा न करना

पिताजी ! मुझको जुदा न करना,
रहूँगी कैसे वतन से जाकर।
वतन बनेगा वहीं तुम्हारा बड़ों
के चरणों में सिर झुकाकर ।।


नया वो घर है नयी वो धरती
नये हैं परिजन सभी विजाने ।
विजानी पुत्री रहोगी कैसे जो
नेह सबसे रहा बढ़ाकर ।।१

वहाँ न माता पिता हैं मेरे
न भाई बन्धु कुटुम्बी मेरे।
है सास माता वहाँ तुम्हारी,
ससुर को रखना पिता बनाकर ।।२

किया है अन्याय यह तुमने कैसा
छुड़ाई माता की गोद मुझसे।
सफल हुए हैं हम आज बेटी
सजन के चरणों में सिर झुकाकर ।।३

हैरान कैसे पिताजी बोलो,
मुझे न गोदी से दूर करना।
नहीं सामर्थ्य अब रोकने की
वचन सर्जन को सुनाऊँ जाकर ।।४

है नीर बहता हुआ नयन से
गले की आवाज रूक रही है।
‘उमा’ तरसती रहीं वे आँख
कहार डोली चले उठाकर ।। ५