क्या उल्टी रीत चलाई जी।
क्या उल्टी रीत चलाई जी।
नित्य कर्म जो करना चाहिये
ऋषि गये बतलाय।
उसको करना छोड़ दिया
अब हुक्के से चित लाय ।।/
करते खूब सफाई जी।।१।।
होते हवन सुगंधि फैले,
देते रोग को टार।
हुक्के से फैले दुर्गन्धि,
होण लगे बीमार ।।
कहते इसे दवाई जी।।२।।










