जिस नर में आत्म-शक्ति हो

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जिस नर में आत्मा-शक्ति हो

जिस नर में आत्म-शक्ति हो,
वह शीष झुकाना क्या जाने।
जिस दिल में ईश्वर भक्ति है,
वह पाप कमाना क्या जाने।
संध्या हवन और ईश्वर भक्ति,
जो प्रातः सायं नित करता है।
वह पत्थर की मूर्ति पर जाकर,
फूल चढ़ाना क्या जाने ।।१।।

माता-पिता गुरूदेवों की जो,
सेवा नित उठ करता है।
वह काशी, मथुरा, हरिद्वार,
गंगा में नहाना क्या जाने।।२।।

जब आत्मा से परमात्मा को,
लिया देख ज्ञान की आंखों से।
प्रकाश हुआ मन में उसके,
वह दीप जलाना क्या जाने ।।३।।

जो देश, धर्म, जाति सेवा हित,
तन-मन-धन अर्पण कर देता।
वह लोभ लालच के वश होकर,
हाथ फैलाना क्या जाने ।।४।।

जो शीष हथेली पर रख के,
मैदान के अन्दर कूद पड़ा।
वह टैंक, तोप, बम्ब गोलों से,
दिल में घबराना क्या जाने ।।५।।

परमेश्वर की भक्ति से शक्ति,
साम गान को जान लिया।
वह स्वांग सिनेमा में जाकर,
धन को लुटवाना क्या जाने ।। ६ ।।

ब्रह्मचर्य की बल शक्ति को,
जिसने अजमा कर देख लिया।
वह विषयों के फन्दे में फंसकर
जी ललचाना क्या जाने।।७।।

सत्य धर्म वेद के मार्ग को,
जिसने एक बार भी जान लिया।
वह इधर-उधर पाखण्डों में मन
को भटकाना क्या जाने ।। ८ ।।

गुरू ईश्वरसिंह की कथा भजन,
नई-नई रंगत को जान लिया।
वह स्वांग सिनेमा की रंगत,
और गन्दा गाना क्या जाने।।६।।