कोई जहर पिलावे कोई ईंट बरसावे राह में
कोई जहर पिलावे
कोई ईंट बरसावे राह में,
पल भर ना रुका योगी
कि पग-पग बढ़ता गया।
ऋषि अलबेला सारे जग में
अकेला जो विरोधियों से
लड़ता गया….।
परोपकार की राहों में
पलभर को
सुख पाया नहीं।
जान पर संकट लाखों बने
‘पथिक’ कभी घबराया नहीं।
ऐसा उत्साही मेरी कौम का
सिपाही हर मोर्चे पर अड़ता गया…
वेद ही ज्ञान है ईश्वर का
सोच समझकर मान लिया।
धूम मचाकर रख दूंगा दिल में
ये ही बस ठान लिया।
योजना बनाके बाजी जान की लगाके
ऊंची चोटियों पर चढ़ता गया….।
देख के भारत की हालत
निरख निरख कर रोता रहा।
पाखण्ड और हालत पर
बहुत दुःखी वो होता रहा।
आंधी बन आया जिस पेड़ को
हिलाया वो हो जड़ से उखड़ता गया…..
धर्म-धुरन्धर पंडित भी
दल-बल के संग आते रहे।
जब शास्त्रार्थों में कुछ ना बना
छल व कपट अपनाते रहे।
छुपते-छुपाते जो भी मारने को
आते उन सबको रगड़ता गया….।










