जमाना कैसा आया है
जमाना कैसा आया है
धर्म-कर्म ईमान सभी
का हुआ सफाया है।
- उधर ये जो जन आते,
भक्त जी नाम कहाते।
फेरते रहते माला,
मगर मन इनका काला।
करते हैं बगुला भक्ति,
नीयत में गड़बड़झाला।
मन्दिर का प्रसाद,
चढ़ावा खूब पचाया है….!
- वो देखो आज के लड़के,
चलें फैशन में अकड़के।
नहीं सत्संग में आते,
फिल्म में रात गंवाते।
वहाँ पर सबक जो सीखा,
वो कालेज में दोहराते।
पिता बेचारा खुश है,
बेटा पढ़कर आया है….।
- सन्त बाबा बम बोला,
भंग से भर रहे झोला।
वो देखो चेली आई,
चिलम चांदी की लाई।
भिगोके शिष्य ने साफी,
लगादी दियासलाई।
दम लगवाके चेलों का
गम खूब मिटाया है….
इधर ये राजपूत (जाट पूत) हैं,
नशे में पूरे धुत्त हैं।
सताते हैं निर्बल को,
अजमाते हैं बल को।
एक दिन खुद काटेंगे,
पाप की पकी फसल को।
कवि ‘राकेश’ ने यही
सोचकर दिल समझाया है….।
ये सबके गुरु खड़े हैं,
सभी वर्षों में बड़े हैं।
हुआ है अब परिवर्तन,
नाम के ही हैं ब्राह्मण।
भेष भर करके जनाना,
नाचते रोज छमाछम।
रंडियों के संग में ये
रांडा बना सुहागा है….।
वाह। लालूमल नेता,
तुम्हें हमने पहले देखा।
बहुत पतले थे भाई,
बढ़ी कैसी मोटाई।
रहते थे नंगे पैरों,
कार अब कैसे आई।
हंसकर बोले भाई,
सब कुर्सी की माया है….।
इधर ये मेहनतकश है,
दोन कितना बेबस है।
रात-दिन खूब कमाता,
सेठ का पेट बढ़ाता।
महीने के अंतिम दिन,
कर्ज भी चुका न पाता।
कवि ‘राकेश’ कमाया किसने,
किसने खाया है….।










