वो मुर्दा है जो स्वाभिमानी नहीं है।
वो मुर्दा है जो स्वाभिमानी नहीं है।
जिस इन्सां की आँखों में पानी नहीं है ॥
‘मुसाफिर’ न कर मरने जीने का खटका-
अजर और अमर है तू फानी नहीं है।
विधाता मेरी कौम को हो गया क्या
कि जिन्दा तो है पर जिन्दगानी नहीं है।
बुजुर्गो हकीकत बयाँ कर रहा हूं-
ये किस्सा नहीं और कहानी नहीं है।
लगाते हैं हर एक की जय के नारे-
किसी की कोई बात मानी नहीं है।
उठे तो उठे कैसे वो कौम जिसके
जवानों में जोशे जवानी नहीं है।
उठेंगे तो तूफान बनकर उठेंगे-
अभी हमने उठने की ठानी नहीं है।
अरे गाफिलो एक हो जाओ मिलकर
अगर मार गैरों की खानी नहीं है।
हैं हिन्दू भी मुस्लिम भी हिन्दोस्तां
में मगर कोई हिन्दुस्तानी नहीं है।
तबाह हो चुका है गुलामी से लेकिन
कोई अब भी भारत का सानी नहीं है।










