दयानन्द के वीर बांके सिपाही
दयानन्द के वीर बांके सिपाही
हलचल मचाने वाले ऽऽऽ
तूफान लाने चले।
स्वाधीनता की ले जिम्मेदारी।
माता की रक्षा प्रतिज्ञा हमारी।
माता के मन्दिर के हम हैं
पुजारी शीश मां को चढ़ाने चले।
आलस की निद्रा में
जो सो रहे हैं।
भाग्य की रेखा को
जो रो रहे हैं।
अवसर को जो व्यर्थ में
खो रहे हैं उनको जगाने चले।
अविद्या व अन्याय और दीनता को।
नफरत के भावों को और हीनता को।
असमानता को पाखण्डता को
जग से मिटाने चले।
गड़-गड़ गरजती हुई बदलियों में।
चम-चम चमकती हुई बिजलियों में।
प्रलय-सा मचाती हुई गोलियों
में होली मनाने चले।
वेदों की ज्योति के परवाने बनकर।
बिस्मिल भगतसिंह के दीवाने बनकर।
आजाद रोशन से मस्ताने बनकर
खुद को मिटाने चले।










