जयति ओ३म् ध्वज व्योमविहारी।
जयति ओ३म् ध्वज व्योमविहारी।
विश्व प्रेम प्रतिमा अति प्यारी ॥
सत्य सुधा बरसाने वाला,
नेहलता सरसाने वाला।
सौम्य सुमन विकसाने वाला,
विश्व विमोहक भवभयहारी ॥
इसके नीचे बड़े अभय मन,
सत्पथ पर सब धर्म-धुरी जन।
वैदिक रवि का हो शुभ उदयन,
आलोकित होवें दिशि सारी ॥
इससे सारे क्लेश शमन हो,
दुर्मति दानव द्वेष दमन हों।
अति उज्ज्वल अति
पावन मन हों,
प्रेम तरंग बहे सुखकारी ॥
इसी ध्वजा के नीचे आकर,
ऊँच-नीच का भेद भुलाकर।
मिले विश्व मुद मंगल गाकर,
पन्थाई पाखण्ड बिसारी ॥
इसी ध्वजा को लेकर कर में,
भरदें वेदज्ञान घर-घर में।
सुभग शान्ति फैले जग भर में,
मिटे अविद्या की अन्धियारी ॥
विश्व प्रेम का पाठ पढ़ावें,
सत्य अहिंसा को अपनायें।
जग में जीवन ज्योति जगावें,
त्यागपूर्ण हो वृत्ति हमारी ॥
आर्यजाति का सुयश अक्षय हो,
आर्यध्वजा की अविचल जय हो।
आर्यजनों का ध्रुव निश्चय हो,
आर्य बनावें, वसुधा सारी ॥










