हम अपने वतन की सेवा में

0
43

हम अपने वतन की सेवा में

हम अपने वतन की सेवा में-2
तन मन धन सारा लगा देंगे-4
सुख-दुःख की कुछ परवाह नहीं
जीवन तक भेंट चढ़ा देंगे ॥

ऋषि दयानन्द के सपनों को
साकार बनाकर छोड़ेंगे।
हर दिल में गंगा समता की 2
हम मिलकर यहाँ बहा देंगे ॥

हम भारतीयों के सेवक हैं,
ये सब अपनी माँ के जाए हैं।
जहाँ उनका पसीना टपकेगा,
हम अपना खून बहा देंगे।

कह दो गुण्डों-मुस्टण्डों से,
हरकत से अपनी बाज आएं।
मैदां में अगर हम डट जाएं
तो नाकों चने चबा देंगे।

हम कृष्ण युधिष्ठिर अर्जुन की,
सन्तान हैं ऐ सुनले दुश्मन ।
हमारे सफल मनोरथ तब होंगे
जब धर्म पे जान गवां देंगे।

उस परमपिता ने हमको भी,
यह वीर निशानी सौंपी है।
हम डंका वैदिक धर्म का सारी
दुनियां में बजा देंगे।

हरदम वसंत यहाँ छायेगी-
पतझड़ नहीं आने पाएगी।
हर काँटे को हम फूलों-सा-2
बस हंसना यहाँ सिखा देंगे।