पास रहता हूं तेरे सदा मैं अरे

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पास रहता हूं तेरे सदा मैं अरे

पास रहता हूं तेरे सदा मैं अरे,
तू नहीं देख पाये तो मैं क्या करूँ।
मूढ़ मृगतुल्य चारों दिशाओं में तू,
ढूंढ़ने मुझको जाए तो मैं क्या करूँ ॥

अति मनोहर सरस भव्य भावों भरा,
विश्व सुन्दर प्रकाश आर्य मैंने रचा।
अपनी करतूत से स्वर्ग वातावरण,
नरक तू ही बनाए तो मैं क्या करूँ ॥

कोसता दोष देता मुझे है सदा,
मुझको ये ना दिया मुझको वो ना दिया।
श्रेष्ठ सबसे मनुष्य तन तुझे दे दिया,
सन्न तुझको न आए तो मैं क्या करूँ ॥

तेरे अन्तःकरण में विराजा हुआ,
कर ना यह पाप देता हूँ उपदेश में।
लिप्त विषयों में हो सीख मेरी भली,
ध्यान में तू न लाये तो मैं क्या करूँ ॥

ज्ञान अच्छे बुरे कर्म का हो सके,
इसलिए मैंने बुद्धि तुझे दी अरे।
तू तम्बाकू अम्ल मद्य-मांस आदि खा,
रोग तन में बसाए तो मैं क्या करूँ ॥

साक फल फूल मेवा व दुग्ध आदि सम,
दिव्य आहार मैंने तुझे हैं दिए।
किन्तु तू मन्दभागी अमृत छोड़कर,
घोर विष आप खाए तो मैं क्या करूँ ॥