इन्सान नहीं इन्सान रहा
इन्सान नहीं इन्सान रहा,
बन गया है पशु समान मेरे भगवान्।
मानव मानवता खो बैठा,
न रही अपनी पहचान मेरे भगवान्।
द्वार तेरे जो आता है,
मुंह मांगा फल पाता है।
मानव-मानव बन जाए,
‘नन्दलाल’ यही अब चाहता है।
विनती है आपसे एक यही,
इन्सान बने इन्सान मेरे भगवान्….।
नित्यकर्म का ध्यान नहीं,
बड़ों का आदर मान नहीं।
राम-भरत और श्रवण जैसी,
दोखे अब सन्तान नहीं।
अब मात-पिता और गुरुजनों का,
होने लगा अपमान मेरे भगवान्….।
वेदों का कुछ ज्ञान नहीं,
सन्ध्या-हवन से प्रेम नहीं,
कहते हैं भगवान् नहीं।
और शुभ कर्मों में दान नहीं।
बस एक ही नारा रह गया है,
रोटी कपड़ा व मकान-मेरे भगवान्….।
मन्दिर (सत्संग) में नहीं आते हैं,
सिनेमा रोज ही जाते हैं।
अण्डे-मछली-मांस हैं खाते,
ह्विस्की खूब उड़ाते हैं।
युवकों की ऐसी देख दशा,
होता है दुःख महान् मेरे भगवान्….।










