मुख से ओ३म् शुभ नाम लो

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मुख से ओ३म् शुभ नाम लो

मुख से ओ३म् शुभ नाम लो,
मन विषयों से थाम लो।
हाथों से यह काम लो कि
शुभकर्मों में दान करो ॥

हैं दुनियां के भोग रोग ये,
इनका कोई हिसाब नहीं।
विषय का विष खा के जग में
बता कौन हुआ बीमार नहीं।
सदाचार के ढंग में,
शक्ति आवे अंग में।
आया करो सत्संग में
‘स्वामी भीष्म’ ये व्याख्यान करो….।

प्रातः सायंकाल हमेशा
नाम प्रभु का गाया कर।
दुःख में सुख में हर हालत में
देश की सेवा ठाया कर।
जिससे बेड़ा पार हो,
जीवन का उद्धार हो।
दुखियों के संग प्यार हो यो
तीन दुखों की हान करो….।

सच्चे शिव को पाना है
तो मैल हटा मन मन्दिर से।
खलक सेवा करके मिलेगा
अलख खलक के अन्दर से।
क्या इससे दूर है,
जब जग में भरपूर है।
इतनी बात जरूर है कि
तुम उसकी पहचान करो….।

दूध में घी रंग मेंहदी में
ऐसे प्रभु समाया है।
करके यत्न मिलता है रत्न
वो जिन खोजा तिन पाया है।
मिलने के लिए योग है,
पर बाधक ये भोग है।
जहां भोग का रोग है,
वहां वेद का ज्ञान करो….।

मृग भटकते हैं वन में
पर नाभि में कस्तूरी है।
कर टटोल घट पट को
खोल ये सिर्फ ज्ञान की दूरी है।
नेत्रों में औषधि होती है,
दर्पण में दिखलादी ज्योति है।
तेरे मन अन्दर एक मोती है,
यदि देखना है तो ध्यान करो….।

नारी सुता-सुत भाई बन्धु
तेरा ना कोई गोती नाती है।
जैसा कर्म करेगा जग में
बस वही जीव का साथी है।
दो दिन जग का मेला है,
यहाँ कौन गुरु और चेला है।
जाएगा जीव अकेला है
फिर मत तुम अभिमान करो…।