जगत में कोई न तेरा मीत (तर्ज-चल उड़ जारे पंछी)
क्यों भूल रहा प्राणी
जगत में कोई न तेरा मीत
१. मकर से माया जोड़ी
तूने बन बैठा धनवान ।
धर्म की दौलत हाथ से
छूटी ओ मूरख नादान।
पाप की गठरी भारी हो गई,
सोच जरा इंसान।
आया जब यमराज बुलाने
कोई न आये समीप ।।
२. इस जग की मोह
माया में न देख कभी भी फंसना।
धोखा इसकी सुन्दर रातें
धोखा इसका सपना।
माता-पिता बेटा या
पत्नी कुछ भी नहीं है अपना।
झूठी जग की प्रेम की
बातें झूठे जग की रीत।।
३. बचपन और जवानी
खोकर तू अब तो समय संभाल।
विषय विकारों के चक्कर में
बीते सत्तर साल।
नंदलाल अब थोड़ी रह गई
इस पर दृष्टि डाल।
मन मंदिर का बन जा
पुजारी गा भक्ति के गीत।
सच बोलो, मीठा बोलो। थोड़ा बोलो, सोचकर बोलो।।










