अक्षर ओ३म् अनादि अपार।
अक्षर ओ३म् अनादि अपार।
जगत् पिता सबके आधार।
धरती-तल में नभ, मण्डल में,
मस्त पवन में पावक जल में।
व्यापक हो तुम हे कर्तार।।
जगत पिता……….
अद्भूत माया पार न पाया,
निराकार निर्लेप अकाया।
रचा जगत कैसे साकार ।।
जगत पिता…………
सुर मुनि साधु संत कवि गायक,
कोयल मोर पपीहा चातक।
तवगुण गाते बारम्बार।।
जगत पिता…………
समय-समय घन जल बरसाते,
वन उपवन चहुं दिशि लहराते।
सुखमय हो जाता संसार।।
जगत पिता ………..
कोष तुम्हारा खुला निरन्तर,
पाते भोजन कीड़ी कुञ्जर।
तुम सम कौन दयालु उदार ।।
जगत पिता………
पावन वेदामृत की धारा,
की प्रदान ऋषियों के द्वारा।
हैं तेरे अनगिनत उपकार।।
जगत पिता………..
ज्ञान ‘प्रकाश’ हृदय में कर दो,
भक्ति भावना उर में भर दो।
विनय यही है बारम्बार।।
जगत पिता………..
संपूर्ण प्रणियों के प्रति
कोमलता का भाव,
गुणों में दोष न देखना, क्षमा,
धैर्य और मित्रों का
अपमान न करना,
ये सब गुण आयु को
बढ़ाने वाले हैं।










