तेरी मेहरबानी का है बोझ इतना
तेरी मेहरबानी का है बोझ इतना,
जिसे मैं उठाने के काबिल नहीं हूँ।
मैं आ तो गया हूँ मगर जानता हूँ,
मैं सिर को झुकाने के काबिल नहीं हूँ।।
ये माना कि दाता हो तुम कुल जहाँ के,
मगर कैसी झोली फैलाऊँ मैं आके।
जो पहले दिया है वो कुछ कम नहीं है,
मैं ज्यादा उठाने के काबिल नहीं हूँ।।१।।
तुम्हीं ने अता की, मुझे जिन्दगानी,
तेरी महिमा फिर भी मैंने न जानी।
कर्जदार तेरी दया का हूँ इतना,
जिसे मैं चुकाने के काबिल नहीं हूँ।।२।।
जमाने की चाहत में खुद को मिटाया,
तेरा नाम हरगिज जुबाँ पे न आया।
गुनहगार हूँ मैं सजावार हूँ मैं,
तुम्हें मुंह दिखाने के काबिल नहीं हूँ।।३।।
यही मांगता हूँ सिर को झुका लूँ.
तेरा दीद इक बार जी भर के पा लूँ।
सिवा दिल के टुकड़े के,
अय मेरे मालिक,
मैं कुछ भी चढ़ाने के काबिल नहीं हूँ।।४।।
सहज मिलै सौ दूध सम,
माँगे मिलै सो पानी।
कहे कबीर वह रक्त सम,
जामै ऐंचा तानि ।।










