श्रद्धा, मेधा, यश प्रज्ञा दो
श्रद्धां मेधां यशः प्रज्ञां
विद्यां पुष्टिं श्रियं बलम् ।
तेज आयुष्यमारोग्यं
देहि ने हव्यवाहनः ॥
श्रद्धा, मेधा, यश प्रज्ञा दो
विद्या पुष्टि दान और बल।
तेज आयु और स्वास्थ्य
पिताश्री देकर हमको करो सबल ॥
कालेवर्षतु पर्जन्यः
पृथिवी शस्य शालिनी।
सर्व जगत् क्षोम रहितो
ब्राह्मणास्सन्तु निर्भयाः ॥
समय समय पर बादल
वर्षे पृथिवी होवे हरी भरी।
फल फूलों से लदी लता हों
कोठी अन्न से रहे भरी ॥
देश के ब्राह्मण निर्भय होंवे,
क्षोम रहित हो जग सारा।
ज्ञाने की ज्योति घर घर जागे
वेद धर्म सब को प्यारा ॥
अपुत्राः पुत्रिणः सन्तु पुत्रिणः
सन्तु पोत्रिणः ।
निर्धनाः सधनाः सन्तु
जीवन्तु शरदः शतम् ॥
पुत्र न हो जिनके भगवन दो
पुत्रों से भर झोली उनकी।
पुत्रवान हो पौत्रवान हो,
हो अभिलाषा पूर्ण उनकी ॥
निर्धन को दो धन दाता
धनवानों को दया धर्म।
सौ सौ वर्ष की आयु होवे
वेद अनुकूल हों सबके कर्म ॥
प्रेम में कष्ट नष्ट हो जाता है
एक महिला बाजार से घर तक 10 किलो वजन का सामान लाने में कष्ट और थकावट अनुभव करती है। परन्तु 15 किलो वजन के अपने लाड़ले बेटे को गोद में लेकर चलने में न तो उसे कष्ट होता है, और न ही थकावट। कारण साफ है-जहाँ प्रेम एवं अपनापन होता है वहाँ कष्ट नष्ट हो जाता है। आचार्य बन्द्रशेखर










