ज्ञान की मशाल है

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ज्ञान की मशाल है

ज्ञान की मशाल है,
ये सूर्य लाल लाल है।
नींद आ रही तुम्हें,
कमाल है कमाल है।

रात कांपती नहीं,
तुम्हें न भोर देखती।
उठो-उठो प्रभात की,
किरण किरण है चीखती।

प्रपात अश्रुपात को ढका
कमाल मृगाल है।
ज्ञान की मशाल है
सूर्य लाल-लाल है।

प्रभात प्राण वायु से
कि पात-पात है हिले।
हंसी-हंसी है पांखुड़ी
सहस्र-दल खिले खिले ।

पाप पंक गन्दगी
सड़ी गली दुलक वही ।
घास फूस की तरह,
सुलग धधक रही।
गिदद मांस खा चुके
मिटे सभी बाल है।

देव दयानन्द की बोध
वेद छन्द का।
प्राण में भरे-भरे प्रकाश
सूर्य-चन्द्र का।
पास आ गया
जुलूस रंग अंतराल है।

तख्त पर देश के कर्णधार-
यथा नेता, संत, वणिक
तथा विद्वान साथ बैठते हैं-
परन्तु वक्त पर प्रायः
इनका बिखराव ही दिखाई देता
है-जिस वक्त-ये
वक्त पर साथ दिखाई देंगे-
उसी वक्त देश का वक्त बदल जायेगा।
आचार्य चन्द्रशेखर