योग साधक सुनो

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योग साधक सुनो

योग साधक सुनो,
साधिकाओं सुनो ईश प्यारो।
साधना हेतु प्रिय जन पधारो ।

ऊषा बेला में पौ फट रही हैं,
अब निराशा निशा हट रही है।
होके निर्मल बदन,
लेके हर्षित सुमन तम निसारों ।

ब्रह्म बेला में नित योगी जागे,
ब्रह्म चिन्तन में निज मन लगाये
कितने ध्यानी बने, कितने ज्ञानी,
तुम विचारो ।

भूल से पाप जो हो गये हैं,
बीज सन्ताप के बो गये ।
बन अहिंसा ! व्रती पढ़के
दर्शन श्रुति, यम सुधारो ।

मोह ममता में जो मन फंसा है,
यश प्रतिष्ठा में निशिदिन धंसा है।
मौन आसन जमा प्राण
गति को थमा, मन उभारो ।

स्वास्थ्य शान्ति को यदि चाहते हो,
रोग चिन्ता हटी चाहते हो।
भोग से चित्त हटा, योग में
चित्त लगा, ध्यान धारो ।

आत्म शुद्धि का पथ जब खुलेगा,
प्यार प्रियतम प्रभु का मिलेगा।
शुद्ध जीवन बना, कर्म
उत्तम कमा, ऋण उतारो।

जब तक ही काया हो निरोगी,
दूर हो मृत्यु जरा,
तब तक सदा करते रहो
धर्माचरण का आसरा।
कल जो करोगे काम सो तो,
आज करना है भला,
घर में लगी जब आग फिर,
कूप खोदने से क्या भला ? – आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री