जिन्दगी एक किराये का घर है

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जिन्दगी एक किराये का घर है

जिन्दगी एक किराये का घर है,
एक न एक दिन बदलना पड़ेगा।
मौत जब भी आवाज देगी,
घर से बाहर निकलना पड़ेगा।

एक मिट्टी का हर आदमी है,
मौत के बाद होना यही है।
या तो उसकी कुर्बत बनेगी,
‘या चिताओं में जलना पड़ेगा.

रात के बाद होगा सवेरा,
देखना हो अगर दिन सुनहरा।
पाव फूलों पे रखने से पहले,
तुझको कांटों पे चलना पड़ेगा।

उससे मिलना अगर चाहता है,
तो उसकी चौखट में धूनी रमादे।
वरना एक दिन तो मजबूर होकर,
तुझको बाहर निकलना पड़ेगा।

ये तस्व्वुर ये जोशे जवानी,
चन्द लम्हों की है ये कहानी
ये जिया शाम तक देख लेना,
चढ़ते सूरज को ढलना पड़ेगा।।

दो दिन का दुनियां में मेला रहेगा,
कायम यह जग में झमेला रहेगा।
लोग भी चलेंगे श्मशान तक,
बेटा भी हक निभायेगा अग्निदान तक।

कोई कहता है कि बस सारा जमाना है मेरा,
कोई कहता है कि अपना बेगाना है मेरा।
कोई कहता है कि कारूँ का खजाना हे मेरा,
यह कोई नहीं कहता कि श्मशान ठिकाना है मेरा ॥