वेदों का सन्देश

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विद्याभास्कर श्री शिवकुमार शास्त्री साहित्याचार्य, एम० ए० (हिन्दी, संस्कृत)

आधुनिक मनुष्य या अर्वाचीन मनुष्य और प्राचीन मनुष्य के बीच किसी सीमा रेखा का खींचना यद्यपि सरल कार्य नहीं है तथापि असम्भव भी नहीं है। आज जो प्रवृत्तियाँ मानव समाज में परलक्षित हो रही हैं वे प्राचीन समाज में नहीं थीं यह कहना तो तर्क संगत एवं औचित्य पूर्ण नहीं कहा जा सकता। परन्तु इतना तो अवश्य पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि ये प्रवृत्तियाँ आज जितनी अधिक विश्वव्यापी तथा दुर्घर्ष हो रही हैं उतनी प्राचीन काल में सम्भवतः कभी नहीं रहीं। कुछ मानवों में तथा मानव समाजों में इन प्रवृत्तियों का बाहुल्य तो सदा ही सृष्टि के आदि से रहा है। इसीलिए देवताओं और असुरों को उपनिषदों में “उभये प्राजा पत्याः” कहकर स्मरण किया गया है। परन्तु आसुरी प्रवृत्तियों का जैसा ताण्डव नर्तन आधुनिक मनुष्य समाज में है वह अभूत पूर्व तथा अद्भुत पूर्व है। आज के आसुर भाव ने वैज्ञानिक प्रगति की सहायता से देशों और राष्ट्रों की सीमाओं को मिटाकर सम्पूर्ण मही मण्डल पर अपना एक छत्त्र साम्राज्य स्थापित कर लिया है। आसुरी भावों की प्रबलता, प्रचण्डता तथा दुर्धर्षता ही आज के मानव समाज को प्राचीन मानव समाज से पृथक् करने में समर्थ है। गीता में योगिराज कृष्ण ने जिस आसुरी सृष्टि का वर्णन किया है हम आज उसे सर्वत्र फूलता और फलता देख सकते हैं। आज का मानव शास्त्रोक्त विधानों का पालन करना तथा निषिद्ध कर्मों का परित्याग करना अपना कर्तव्य नहीं समझता। आज का पढ़ा लिखा व्यक्ति आस्तिकता का उपहास करता है। इंग्लैण्ड में एक बार ईश्वर के विषय में लोगों के विचार जानने का प्रयास करने पर ८० प्रतिशत से अधिक वैज्ञानिकों, स्नातकों, विद्वानों ने ईश्वर के मांनने में अपनी असहमति व्यक्त की। ईश्वर को हटा देने पर सृष्टि का उद्देश्य केवल प्राणिमात्र की भोग और काम की तृप्ति के अतिरिक्त और हो ही क्या सकता है। अतः आज मानव काम और भोग को अपने जीवन का लक्ष्य बनाकर स्वयं ही अपने विनाश को निमन्त्रण दे रहा है।

गीता के शब्दों में-

इद मद्य मयाल्ब्धामिमं प्रापस्ये मनोरथम्।

इद आनंदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।।

असौ माया हतः शत्रुर्हन्निष्ये चापराणपि।

ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी।।

आज की समस्त योजनायें अर्थ और काम की पूति को दृष्टि में रख- कर बनाई जा रही हैं। ये दोनों ही आज मानव प्रेरणा के स्रोत हैं। यहाँ तक कि धर्म के क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति भी इनकी लपेट से अपने आप को बचा नहीं पाते हैं। आज धन ही मनुष्य की योग्यता का माप दण्ड बन गया है। आज योगी भी वही बड़ा है जो वायुयान से यात्रा करता है तथा सम्पत्तिशाली है।

मानव जीवन में अर्थ और काम की आवश्यकता है। इसलिए इनके लिए प्रयत्न भी अपरिहार्य हैं। इसीलिए उपनिषत्कार ने “अन्नं बहुकुर्यात् तद् व्रतम्” कहकर अन्नोत्पादन की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। इसीलिए पुरुषार्थ चतुष्टय में अर्थ और काम को स्थान दिया है। परन्तु इन दोनों को धर्म और मोक्ष से मर्यादित कर दिया गया है। आत्मा को उन्नति के लिए धर्म और मोक्ष को प्रथम और अन्तिम स्थान देकर शरीर के विकास के लिए धर्म पूर्वक अजित अर्थ के द्वारा धर्म से मर्यादित काम की पूति को द्वितीय स्थान दिया गया है। इसीलिए गीता में भी “धर्माऽविरुद्धः कामो- ऽस्मि” कहकर धर्म अविरुद्ध काम को हेय न मानकर उपादेय माना है। परन्तु धर्म को अफीम कहकर तथा ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार करके आज मनुष्य वित्तैषणा और कामैषणा का शिकार हो रहा है। वह नहीं जानता कि अमर्यादित भोग स्वयं उसी को भोग डालेंगे और उसे पश्चाताप के साथ-

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता” दर्शन पर भरोसा कर देंगे। ऐसी स्थिति में “खाओ, पियो और मौज करो” का आदर्श वाक्य मानने वाले, कामनाओं की पूति के लिए समस्त शिष्टाचारों और नियमों को तिलाञ्जलि देने वाले, जनसंख्या की वृद्धि को रोकने के लिए भ्रूण हत्या और गर्भपात को भी मान्यता देने वाले, सम लैंगिक मैथुन की वैधता को स्वीकार करने वाले मानव समाज को वेदों का सन्देश सुनाना क्या सम्भव है ? क्या वह सन्देश श्रवण विवरों से होकर मनुष्य के अन्तस्तल में प्रवेश पा सकेगा ? आज लाउडस्पीकर और मुद्रण यन्त्रों के आविष्कार से यह सम्भव हो गया है कि हम घर बैठे लोगों को वेदों का सन्देश सुनने पर बाध्य कर दें, उनके घरों में वेद की पवित्न पुस्तकें पहुंचा दें। ऐसा प्रयत्न हो भी रहा है। लाउडस्पीकर लगा कर अखण्ड रामायण का पाठ करके इसी उद्देश्य की पूति करने वाले धर्म प्राण भारतवासी अपने पड़ोसियों की नींद हराम करके यश के भागी बन रहे हैं। विद्यार्थी और रोगी उनकी इस धर्म भावना से उपकृत होकर शुद्ध हृदय से उनके कल्याण की कामना करते हैं। एक ओर अधिकांश मानव समाज ईश्वर और धर्म का अस्तित्व स्वीकार नहीं करता और दूसरी ओर धर्म और ईश्वर के नाम पर ऐसे कार्य हो रहे हैं कि ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखने वाले तथा धर्म को मानने वाले भी दांतों तले उंगली दबा कर रह जाते हैं।

वेदों का मानव मात्र के लिए जो सन्देश है, जिस पर चल कर वह सुख और शान्ति प्राप्त कर सकता है यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय के प्रथम मन्त्र में प्रतिपादित किया गया है:

ईशावास्यमिदं सर्वं यत् किञ्च जगत्यां जगत्।

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मागृधः कस्य स्विद् धनम्।।

आस्तिकता हमारे मानव समाज रूपी प्रासाद की आधार शिला है। परन्तु आस्तिकता असली होनी चाहिए नकली नहीं। आज के मिलावट के युग में जहाँ डालडा भी असली नहीं मिलता, जहाँ राजधानी में मिट्टी के तेल में भी पानी मिला दिया जाता है असली आस्तिकता का मिलना कितना दुष्कर है यह हम सभी जानते हैं। आस्तिकता के नकली होने के कारण हमारे प्रासाद की नींव ही दृढ़ नहीं हो पाती तब उस पर भव्य भवन का निर्माण कैसे किया जा सकता है। जैसे नकली औषधियाँ जीवन की रक्षा न करके उसके विनाश का साधन बनती हैं ठीक वही दशा आज आस्तिकता की भी हो रही है। यदि मनुष्य को समस्त सृष्टि में व्यापक परमेश्वर की सत्ता पर पूर्ण विश्वास हो जाय तो वह विनाशकारी एटमबमों का निर्माण करके समस्त मानव समाज के साथ स्वयं अपने विनाश के मार्ग का निर्माण क्यों करे। दूसरी बात जो इस मन्त्र में प्रतिपादित की है वह इस भौतिक संसार की विनश्वरता है। इससे हमारे प्रासाद का गगनचुम्बी वाह्य रूप निर्मित होता है। इसी संसार की विनश्वरता की भावना को हृदयंगम कराने के लिए बालक भोज ने अपने चाचा मुञ्ज को पत्त्र लिखा था :-

मान्धाता च महीपतिः कृत युगालंकार भूतो गतः,

सेतुर्येन महोदधेः विरचितः क्वासौ दशास्यान्तकः।

अन्ये चापि युधि प्रभृतयोयाता दिवं भूपते!

नैके नापि समंगता वसुमति मुञ्जत्वया यस्यति।।

संक्षेप में जिसका भाव यही है कि हे राजन् मुञ्ज ! मान्धाता, राम और युधिष्ठिर एक से एक बढ़कर राजा संसार में हुए परन्तु यह पृथ्वी किसी के साथ नहीं गई परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि आप इसे अपने साथ लेकर जायेंगे। राजा मुञ्ज की आँखें खुल गई। उसने भोज के बध से दुःखी होकर आत्महत्या करनी चाही। तब उसके सामने भोज के सुरक्षित होने का तथ्य प्रकट किया गया। संस्कृत साहित्य में वेद मन्त्र के इस द्वितीय भाग की प्रतिध्वनि अनेकशः कवियों की कविता में प्रतिध्वनित होती हुई कर्ण गोचर होती है।

धनानि भूभौ पश्वश्च गोष्ठे, नारी गृह द्वारि सखा श्मशाने।

देहश्चितयां परलोक मार्गे धर्मानुगो गच्छति जीव एकः।।

धन, पशु, पत्नी, मित्र, पुत्त्र यहाँ तक मनुष्य की देह भी केवल चिता- तक ही मनुष्य का साथ देती है। तब इन विनश्वर वस्तुओं के लिए उस धर्म का परित्याग करना कहाँ तक न्याय संगत है जो परलोक यात्रा का एक मात्र साथ है। मन्त्र के तृतीय भाग में वह शिक्षा दी है जो मानवता का भूषण है। इसी शिक्षा के द्वारा हम उस मानव समाज के भव्य भवन की आन्तरिक सजावट कर सकते हैं। त्याग ही पशुओं और मनुष्यों की विभा- जक रेखा है। यही त्याग मनुष्य में देवत्व का विकास करने में समर्थ हो सकता है। इस त्याग के द्वारा ही मनुष्य अमृतत्त्व की प्राप्ति कर सकता है। त्यागेनै केन अमृतत्व मानशुः” इस औपनिषदिक सूक्ति में त्याग की महत्ता का ही दिग्दर्शन कराया गया है। मन्त्र का चतुर्थ चरण इस त्याग को बद्ध मूल करने का उपाय बताता है। यह उस सजावट को सदा अम्लान बनाये रखता है। यदि लोभ ने हृदय में पदार्पण कर दिया तो त्याग वहाँ कब तक टिक सकता है। अतः त्याग के स्थायित्व के लिए हृदय में सांसारिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति का निरसन होना अपरिहार्य है।

इस प्रकार इस एक वेद मन्त्र की शिक्षाओं को ही यदि आज का मानव समाज अपने जीवन में चरितार्थ कर सके तो उसकी समस्त समस्याओं का अन्त हो सकता है। उसके मार्ग के कण्टक पुष्पों में परिवर्तित हो सकते हैं। उसके सम्मुख विस्तृत विनाश का मार्ग समाप्त होकर नवीन विश्व की रचना का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। परन्तु आज का भोगवादी मानव वेद की इस शिक्षा को ग्रहण करने की दिशा में अग्रसर होगा क्या ?

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